305 ईस्वी में डायोक्लेटियन के सेवानिवृत्त होने के बाद सत्ता के लिए खूनी संघर्ष शुरू हो गया। कॉन्स्टेंटाइन अपने पिता की सेना में शामिल हो गए और 306 ईस्वी में पिता की मृत्यु के बाद सेना ने उन्हें सम्राट घोषित कर दिया। इसके बाद के वर्षों में, उन्हें कई विद्रोहियों और प्रतिद्वंद्वी शासकों से लोहा लेना पड़ा।
कॉन्स्टेंटाइन का जन्म लगभग 272 ईस्वी में मेसिया (आधुनिक सर्बिया) में हुआ था। उनके पिता कॉन्स्टेंटियस क्लोरस रोमन सेना के एक उच्च अधिकारी थे और बाद में पश्चिमी रोमन साम्राज्य के सम्राट बने। कॉन्स्टेंटाइन ने अपनी युवावस्था का अधिकांश समय सम्राट डायोक्लेटियन के दरबार में बिताया, जहाँ उन्होंने सैन्य और प्रशासनिक कौशल सीखे।
प्रभावित होकर, कॉन्स्टेंटाइन ने अपने सैनिकों की ढालों पर ईसाई प्रतीक 'क्राइस्टोग्राम' (Chi-Rho) बनवा दिया। मिल्वियन ब्रिज के युद्ध में उन्होंने मैक्सेंटियस को बुरी तरह पराजित किया। यह जीत रोमन साम्राज्य के लिए तो चरम पर थी ही, साथ ही इसने कॉन्स्टेंटाइन को ईसाई धर्म की तरफ झुका दिया। हालाँकि उनका पूर्ण बपतिस्मा अपने जीवन के अंतिम समय (337 ईस्वी) में हुआ, लेकिन इस घटना के बाद से वे ईसाई धर्म के संरक्षक बन गए।
कॉन्स्टेंटाइन ने सिर्फ ईसाई धर्म को स्वतंत्रता ही नहीं दी, बल्कि उसके भीतर एकता स्थापित करने का भी प्रयास किया। 325 ईस्वी में उन्होंने 'निकिया की परिषद' (Council of Nicaea) बुलाई। यह ईसाई इतिहास की पहली विश्वव्यापी परिषद थी, जिसमें ईसा मसीह के देवत्व और त्रिएकत्व (ट्रिनिटी) सिद्धांत को मान्यता दी गई। इस परिषद ने नाइसिन पंथ (Nicene Creed) की रचना की, जो आज भी कई ईसाई संप्रदायों में प्रार्थना का हिस्सा है।
कॉन्स्टेंटाइन के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना 312 ईस्वी में घटी। रोम की ओर बढ़ते समय, उनका सामना प्रतिद्वंद्वी सम्राट मैक्सेंटियस से हुआ। कहा जाता है कि इससे पहले कॉन्स्टेंटाइन ने आकाश में एक चमकता हुआ क्रॉस देखा जिस पर लिखा था - "इस निशान में तू जीतेगा" (In Hoc Signo Vinces)।
इतिहास के पन्नों में कुछ शासक ऐसे होते हैं जो सिर्फ अपने युग को ही नहीं, बल्कि सदियों के भविष्य को भी प्रभावित करते हैं। फ्लेवियस वैलेरियस औरेलियस कॉन्स्टेंटाइन, जिन्हें 'कॉन्स्टेंटाइन द ग्रेट' के नाम से जाना जाता है, बिल्कुल ऐसे ही शासक थे। वे रोमन साम्राज्य के उस सम्राट थे जिन्होंने न केवल एक विशाल साम्राज्य को फिर से एकजुट किया, बल्कि विश्व के सबसे बड़े धर्मों में से एक, ईसाई धर्म, को भूमिगत से बाहर निकालकर सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाया।
यहाँ विषय "कॉन्स्टेंटाइन" पर हिंदी में एक लेख प्रस्तुत है:
कॉन्स्टेंटाइन ने एक और ऐतिहासिक निर्णय लिया। उन्होंने रोम को छोड़कर बोस्फोरस जलडमरूमध्य के किनारे बसे प्राचीन शहर 'बीजान्टियम' को नई राजधानी बनाने का फैसला किया। 330 ईस्वी में इस शहर का उद्घाटन हुआ और इसे 'नोवा रोमा' (न्यू रोम) नाम दिया गया, लेकिन यह 'कॉन्स्टेंटिनोपल' (आज का इस्तांबुल) के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह शहर अगले हज़ार सालों तक ईसाई दुनिया की राजधानी रहा।